Friday, June 17, 2005

परिचय

rajen jaipuria
13 अगस्त 1948 को जयपुर, कोरापुट (ओड़ीशा) में जन्में डॉ॰ राजेन जयपुरिया हिन्दी साहित्य में एम॰ए॰ तथा पी-एच॰डी॰ हैं। हिन्दी साहित्य में गहरी अभिरुचि रखने वाले डॉ॰ जयपुरिया 1968 से हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन कर रहे हैं। आपकी रचनाओं का प्रकाशन राष्ट्रीय स्तर की पत्र–पत्रिकाओं में हो रहा है, अनेक सहयोगी संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं। हाइकु-दर्पण में आपके हाइकु प्रकाशित हुए हैं। इंन्टरनेट पर भी आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
[हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध जालघार अनुभूति पर माह के हाइकुकार के रूप में आपके हाइकु प्रकाशित हुए हैं तथा हिन्दी कविताओं के काव्य संकलन काव्य कुंज में आपकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं।]
प्रकाशित कृतियाँ- सोपानों के स्वर (काव्य-संग्रह)अगस्त 2003
सम्प्रति- ओड़िशा शिक्षा सेवा के अन्तर्गत हिन्दी अध्यापन
सम्पर्क- रीडर एवं अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग,
विनायक आचार्य महाविद्यालय,
पोस्ट- ब्रह्मपुर (गंजाम) ओड़िशा -760006
दूरभाष-0680-2261691
ई मेल- dr_rjaipuria@yahoo.co.in

जाल-घर : संम्पर्क-सूत्र

विभिन्न जाल-पत्रिकाओं पर प्रकाशित डॉ॰ राजेन जयपुरिया की रचनाओं के संम्पर्क-सूत्र-

अनुभूति पर माह के हाइकुकार- gg


हाइकु कानन (हाइकु संकलन)- gg

काव्य-कुंज (काव्य-संकलन)- gg

20 हाइकु कविताएँ


खाली पींजरा
हिलती अलगनी
पंछी नभ में !


***
सूरज जागा
ठिठुरता हुआ-सा
बिन कम्बल !

***
शीत कपोत
डैने फड़फड़ाये
ऊँघती ऊषा !

***
तमकी धारा
तमतमाया रवि
सहमा जरा !

***
सूरज तवा
सेंक रही रोटियाँ
गरम हवा !

***
झाँकता जाता
पावस में नीरद
स्त्रोत्र सुनाता !

***
बटुक भौंरा
वेद गुनगुनाये
कली–गली में !

***
भाँग गुलाल
होली औ धमाल
गूँजे चौपाल !

***
गुतला जाता
किरन करों से है
रवि, कली को !

***
झपकी लेता
तारा, सवेरा उसे
थपकी देता !

***
पंक ही मिला
कुमुद–पद्म खिला
कोई न गिला !

***
गोधूलि बेला
हाँफता लौट चला
अर्क अकेला !

***
जेठ ने लिखी
पाती पुरवाई को
आओ मितवा !

***
लू जब चले
सरकी पगडंडी
रहट तले !

***
पुलिन पर
कुल–कुल की ॠचा
गाये समीर !

***
गले मिलते
सफेद काले मेघ
होली खेलते !

***
मन निर्बन्ध
महुए की सुगन्ध
पथिक अंध !

***
बैरिन बेरी
कदली–पाती डरी
चीर न डाले !

***
हिम के संग
हेम भी बदरंग
तुषार दंग !

***
शीत लहर
बज रही ठठरी
दुबका चाँद !

***

-डॉ॰ राजेन जयपुरिया

17 हाइकु कविताएँ

दोहरी हुई

लाज से, पवन को

छूकर लता !

***


देखो तनिक

बसन्त है धनिक

बाँटे कलियाँ !
***


छटपटाते

सुधि के स्वर, कहाँ

लौट वे पाते ?
***


हवाएँ ठंडी
हैं बड़ी ही घमंडी
इतरा रही !

***
भावों से भरे
हृदय को रुचती
अगायी गीति !

***
भूखा रहके
औरों को खिला देना
यही संस्कृति !

***
दाँयें या वाँयें
चौक पर दिशायें
हाथ हिलायें !

***
अबोले बैन
बरस पड़ें नैन
सुन लो गर !

***
कब मिलेंगे
अवनि औ अम्बर?
अबोली प्रीति !

***
तुम न आये
सदा निकट रही
तुम्हारी स्मृति !

***
व्योम छतरी
बचा नहीं पाये क्यों
भीगे धरती ?

***
एकान्त भूत
दबोचे, कातें तब
सुधियाँ सूत !

***
गुदगुदातीं
चीटियाँ भी पेड़ को
जब चढ़तीं !

***
मौन को तोड़ें
लहरों के मंजीरे
नदिया तीरे !

***
बोले खंजन
करो नव श्रृंगार
आँजों अंजन !

***
हँसता फूल
रोये मन ही मन
होना है धूल !

***
मन पपीहा
टेरता अहर्निश
सुने ना पिया !
***

-डॉ॰ राजेन जयपुरिया